- उत्कर्ष गहरवार 

भगवान् शिव को आदि योगी कहा जाता है. उनकी पूजा और आराधना के प्रमाण सिंधु घाटी जैसी प्राचीन सभ्यता के अवशेषों में भी मौजूद हैं. आसानी से प्रसन्न होने वाले और सबका कल्याण करने वाले भगवान शिव की आराधना वैसे तो वर्ष भर की जाती है किन्तु श्रावण मास में उनके दर्शन तथा पूजा का विशेष महत्त्व है. रीवा तथा इससे जुड़े ज़िलों सीधी एवं सतना में ऐसे कई शिवालय हैं जहाँ दूर दूर से लोग अपनी मनोकामना पूर्ण करने के लिए दर्शन हेतु पहुंचते हैं. देव तालाब,घिनौची धाम,वीरसिंघपुर बढ़ौरा नाथ तथा चंद्रेह के शिव मंदिर ऐसे ही आस्था के केंद्र हैं. इनमे से चंद्रेह भले ही अपेक्षाकृत कम चर्चित हो किन्तु ऐतिहासिकता,शिल्पकला एवं प्राकर्तिक सौंदर्य के दृष्टि से यह विशिष्ट है. विंध्य की दो महत्वपूर्ण नदियों गोपद बनास एवं सोन के संगम पर स्थित प्राकर्तिक सौंदर्य से भरपूर भंवरसेन से थोड़ी ही दूरी पर स्थित चंद्रेह का इतिहास लगभग एक हज़ार वर्ष पुराना है.
चंद्रेह शिव मंदिर का गुम्बद बोध गया के भगवान् बुद्ध के मंदिर से काफी मिलता जुलता है. समीप में स्थित पहाड़ियां,वन एवं सोन नदी का किनारा इसके चारों ओर के क्षेत्र को बेहद खूबसूरत बनाता है. धार्मिक आस्था से हटकर भी देखा जाए तो प्राकर्तिक रूप से यह एक रमणीय स्थल के रूप में सभी को अपनी ओर आकर्षित करने की समार्थ्य रखता है. भंवरसेन से होकर गुजरने के दौरान खड़ी हुई ऊँची चट्टानें, दूर तक बिखरा हुआ सफ़ेद बालू का विशाल भण्डार, हरे-भरे वन और उनके बीच से बहता हुआ स्वच्छ निर्मल जल पहले ही आने वाले का मन मोह लेते हैं.रही सही कसर शिव मंदिर की प्रचीन शिल्प कला को देखकर पूरी हो जाती है.
विशाल चट्टानों को काटकर बनाये गए विहार को देखना एवं इसमें भ्रमण करना भी अद्भुत शांति प्रदान करता है.मंदिर के ठीक बगल में स्थित इस विहार में खुले बरामदे,आँगन एवं ध्यान हेतु एकांत का अनुभव कराने वाले विशेष कक्ष स्थित हैं.भारतीय पुरातत्व संस्थान द्वारा संरक्षित इस परिसर को काफी साफ़ सुथरा रखा जाता है जहाँ आने वाले दर्शनार्थी सुकून के पल बिता सकते हैं. रीवा संभागीय मुख्यालय से पचास किलोमीटर एवं सीधी के जिला मुख्यालय से ३५ किलोमीटर दूर स्थित इस शिव मंदिर में रीवा,सीधी एवं सतना ज़िलों से प्रकृति प्रेमी दर्शनार्थ पहुंचते हैं. 
यह मंदिर चेदि वंश द्वारा 850 से 1015 ईस्वी के प्रारम्भिक काल का है. ये प्रबोधशिव के गुरु द्वारा बनवाया गया था जो मत्तमयूर सम्रदाय के मानने वाले शैव योगी थे. इसके पास का विहार प्रबोधशिव के द्वारा बनवाया गया था जो चेदि शासकों के गुरु के रूप में जाने जाते थे. यह दो मंज़िला विहार, मन्दिर निर्माण के लगभग पचास वर्ष के पश्चात बन कर पूर्ण हुआ था. विहार के एक अभिलेख के अनुसार यह निर्माण कार्य 972 ईस्वी में पूर्ण हुआ था. 
शिल्पकला की बात करें तो यह मंदिर ऊँची जगती पर निर्मित है.इस मंदिर में एक गोलाकार गर्भग्रह,अंतराल और मंडप हैं. गर्भगृह का शिखर सघन चैत्यमुखों से अलंकृत है.शिल्पकला की विशिष्टता मध्ययुगीन शिल्प की अभियांत्रिक प्रवीणता का परिचायक है. स्तम्भ और धरण, ब्रैकेट और विशालकाय फलक इत्यादि का प्रयोग काफी हुआ है और लगभग 1000  वर्षों से इसे विध्वंश होने से रोके रखा है,स्वयं में एक आश्चर्य है. एक विशेष आकर्षण इस मंदिर का यह है और कई वीडिओज़ में इसकी बात की गयी की मंदिर से चढ़ावा, दूध,अनुपयोगी पानी की निकासी के लिए जो जानवर के आकर की निकासी है वो बड़ी अपने आप में एक अद्भुत चीज़ है जिसके ठीक नीचे छिद्र है जहाँ मंदिर से जुड़ी अनावश्यक चीज़ें उसमे जाती तो जरूर हैं पर कहाँ गायब हो जाती हैं ये किसी को ज्ञात नहीं. पर्यावरण को लेकर सजगता ही कही जाएगी की उस ज़माने में भी लोगों में पर्यावरण और प्रकृति को लेकर कितनी जागरूकता थी. 
उल्लेखनीय है की यह क्षेत्र बाणभट्ट की कर्मस्थली रहा है.इन्ही के नाम पर उत्तर प्रदेश,मध्यप्रदेश और बिहार की सोन नदी पर स्थित साझी परियोजना का नाम बाणसागर परियोजना रखा गया है.प्राकृतिक,साहित्यिक, सांस्कृतिक एवं आध्यात्मिक धरोहरों को सहेजने के लिए विंध्य अंचल के संवेदनशील लोगों द्वारा यहाँ के समीप श्रोण महोत्सव का प्रतिवर्ष आयोजन किया जाता है.समीप में ही भंवरसेन में १४ जनवरी को खिचड़ी का विशाल मेला लगता है.
कुलमिलाकर चंद्रेह अपने नैसर्गिक एवं आध्यात्मिक महत्त्व के कारण लोगों को अपनी ओर आकर्षित करने की पर्याप्त छमता रखता है. चंद्रेह के समीप भंवरसेन से परसिली तक पर्यटन को बढ़ावा देने के उद्देश्य से सुन्दर सड़क का निर्माण कराया गया है. यह सड़क गोपद बनास नदी के सामानांतर घाटियों,पहाड़ियों एवं सुरम्य वन क्षेत्र से होकर गुजरती है. इसी सड़क पर रास्ते में नौढिया का प्रसिद्ध कठबँग्ला भी स्थित है. आने वाले दिनों में पर्यटन के लिहाज़ से यह समूचा अंचल लोगों के आकर्षण का केंद बनने वाला है.

- लेखक बैनेट यूनिवर्सिटी में एमजेएमसी के स्कॉलर हैं 

न्यूज़ सोर्स : Good Morning Rewa