लेखक: सुशील कुमार 'नवीन' 

हमारे एक पड़ोसी है श्रीमान नवरत्न जी। एक प्राइवेट कम्पनी में ऊंचे ओहदे पर कार्यरत हैं। महीने में 20 दिन तो टूर पर ही रहते हैं। कम्पनी ने गाड़ी भी दी हुई है। लॉकडाउन से पहले वाले ही दिन घर लौटे थे। जब वो घर पर रहते हैं तब उनका रुतबा किसी बड़ी सियासत के राजा से कम नहीं होता है। सुबह की शुरुआत बेड टी से होती है। फ्रेश होकर आते तो हाथ में उनकी पसंद का टूथपेस्ट और उनका रॉयल टूथब्रश लिए धर्मपत्नी खड़ी मिलती है। जब तक ब्रश आदि करते तब तक बाथरूम में टॉवल, अंडरवियर और बनियान पहुंच जाते  हैं। नहाकर वापस आते हैं तो डाइनिंग टेबल पर उनकी पसंदीदा व्यंजन भीनी-भीनी खुशबू महकाते मिलते हैं। जाते समय पत्नी अपने हाथों से टाई बांधती और कोट पहनाकर मुस्कराते चेहरे से विदा करती हैं। साथ में ये कहना कि आप तो यूं आते हो और चले जाते हो। हमारे लिए तो आपके पास टाइम ही नहीं है। इस बार भी ज्यादा दिन लगाए तो मैं आपसे बात नहीं करूंगी। मन ही मन पत्नी प्रेम का रसास्वादन करते नवरत्न जी निकल जाते हैं।
अब आप सोच रहे हैं कि यह तो अच्छी बात है। इतना आदर मान तो किस्मत वालों को मिलता है। नवरत्न जी तो पूरे राजसी स्वाद ले रहे हैं तो मुझे जलन सी क्यों हो रही है। अब मेरा जवाब भी सुन लीजिए। लोकडाउन से पहले राजसी स्वाद लेने वाले नवरत्न जी का दिल का दर्द अब रुलाने वाला है। शुक्रवार देर शाम खाना खाने के बाद छत पर टहलने गया तो जो सामने की दूसरी मंजिल पर जो मैंने देखा वो हैरान करने वाला था। हर समय टिपटॉप रहने वाले नवरत्न जी पायजामा बनियान में पसीना-पसीना थे। हाथ में झूठी थाली रसोई की तरफ जा रहे थे। मैंने सोचा कि रसोई की तरफ जा रहे होंगे सो ये बर्तन उठा लिए होंगे। इतने में उनकी श्रीमती जी की आवाज सुनाई पड़ी। दो थाली और रह गई है उन्हें भी ले जाना। सुनो चाय वाला पतीला अच्छी तरह मांजना। पत्नी के ये कहने पर वे वापस लौटे तो उनका चेहरा देखने लायक था। गुस्से-गुस्से में बोले-और भी दे दो। अब इसी काम के रह गए है। पत्नी बोली-घर के चार बर्तन साफ कर दिए तो क्या हो गया। नवरत्न जी की हालत देखकर मैं चुपचाप नीचे उतर गया।
सुबह दूध लाने के समय उनसे मुलाकात हो गई। मैंने भी मजाक-मजाक में छेड़ दिया। आजकल तो भाई साहब ! घरवालों की पूरी सेवा कर रहे हो। मेरे ये कहते ही वो बोल पड़े। ले लो शर्मा जी स्वाद। लोकडाउन ने सारी हेकड़ी निकाल कर रख दी है। मैने पूछा ये तख्तापलट कैसे हो गया।
नवरत्न जी बोले- अब कहीं बाहर जाना तो है नहीं। 24 घंटे इसी घेरे में रहना है। दो-चार दिन तो ठीक गुजरे। अब चाय खुद बनानी पड़ रही है। खाना रसोई से लाना पड़ रहा है। एक गिलास पानी मांग ले तो जवाब मिलता है खाली बैठे हो, पानी तो ले ही सकते हो। कपड़े बदलने की कहता हूं तो सुनना पड़ता है-कौन तुम्हें देखने आ रहा है। कौन धोएगा रोज-रोज कपड़े। एक टी शर्ट-पायजामे में 10 दिन निकल रहे हैं। मैं बीच मे ही बोल उठा- यहां तक तो ठीक है, ये बर्तन साफ करने वाला क्या मामला है। बोले-वर्क फ्रॉम होम। मैने कहा-इसका मतलब तो ये है कि घर पर रहकर काम करो, घर का काम नहीं। बोले-भाई मुझे और आपको तो इसका मतलब समझ में आ रहा है पर विद्वानों को कौन समझाए। उनके अनुसार तो वर्क फ़ॉर होम मतलब घर के लिए काम है। मैने कहा-तो आपने घर पर इस बारे में बताया नहीं। बोले-बताया था भाई। कम्पनी के काम घर से ही कर रहा हूं। एक दिन अपने जूनियर को फोन किया था। फोन उनकी पत्नी ने उठाया, पूछा तो बताया जी वो तो सब्जी बना रहे हैं। मैं फोन काट कर हसने लगा।क्या दिन आ गए हैं, वर्मा को सब्जी बनानी पड़ रही है। यहां तक भी ठीक रहा। अगले दिन बॉस को रिपोर्ट देने की सोची। फोन मिलाया तो फोन उनके छोटे बेटे ने उठाया। बॉस को फोन देने को कहा तो बोला-पापा तो बाथरूम साफ कर रहे हैं। अब बेचारे को उसको ये थोड़े पता था कि ये बात बताने की नहीं होती। उसने तो बालमन से कह दी। वर्मा की तरह बॉस वाली बात पत्नी को क्या बताई मेरे तो उलटे दिन शुरू हो गए। बोली-जब जूनियर बर्तन धो रहा है सीनियर बाथरूम साफ कर रहा है तो आप कौनसी नई दुनिया से हो। लोकडाउन में जब सब काम कर रहे हैं तो आप भी कर लो। कुछ बिगड़ थोड़े ही जाएगा। उस दिन से शुरू हुआ काम लगातार बढ़ता ही जा रहा है। आनाकानी करे तो सीधे जवाब मिलता है आप कोई अलग थोड़े ही हो। जब सब कर रहे हैं तो आप भी कर लो। वो बन्द कर दें तो आप भी बंद कर देना। अब बस इंतजार कर रहे हैं कब लोकडाउन खुले और कब वर्क फ़ॉर होम से पीछा छूटे। यह सुन नवरत्न जी को मैने इतना ही कहा ये बात अब किसी और को मत बताना। अन्यथा औरों के लिए भी वर्क फ्रॉम होम , वर्क फ़ॉर होम हो जाएगा।

- लेखक को पत्रकारिता में 20 वर्ष का अनुभव है। फिलहाल लेखक स्वतन्त्र लेखन और शिक्षण कार्य में जुटे हुए हैं। 

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