लेखक- सुशील कुमार 'नवीन' 

लगता है ये लॉकडाउन का पीरियड मुझे पूरा डॉक्टर बना कर ही छोड़ेगा। हर किसी को समाधान मुझसे ही चाहिए। जब भी कभी फोन बजता  है तो बच्चे भी बोल उठते हैं। पापाजी के किसी पेशेंट का फोन होगा। लोकडाउन स्पेशलिस्ट जो हैं।  रात को नींद देर से आई थी। बाहर जाना नहीं था। ऐसे में सोचा था कि आज 9 बजे से पहले नहीं उठूंगा। मोबाइल को भी साइलेंट मोड में छोड़ रखा था। ताकि सुबह-सुबह कोई तंग न करे। पर हमारा तो सारा जग दुश्मन है ना। 

मुझे छोड़कर घर के सभी सदस्य समय से जगे हुए थे। एक बार मॉर्निग टी के लिए जगाने का प्रयास भी किया गया। पर मैने मना करते हुए साफ आदेशित कर दिया था कि मुझे जगाने का प्रयास न किया जाए। अब घरवाले तो माने हुए थे पर मेरा भला चाहने वाले थोड़े मानने वाले थे। उनकी नजरों में तो दुनिया में सबसे ज्यादा खाली तो मैं ही बैठा हूं। जब चाहो कस्टमर केयर की तरह कॉल कर देते हैं। खैर छोड़िए ये तो रोजमर्रा की जिंदगी है।आज की सुनिए। मैं सोया हुआ था पर मेरा फोन जाग रहा था। मेरे गगनभेदी खरांटों के बीच उसकी वाइब्रेशन पहाड़ पर चींटी की तरह थी। ऐसे में मुझे कोई फर्क नहीं पड़ रहा था। इसी दौरान बेटे पीयूष का कमरे में आना हुआ तो उसने फोन में कम्पन महसूस किया। बालमन के चलते उसने मुझे जगाया तो नहीं पर फ़ोन उठा लिया। 

हैलो कहते ही दूसरी ओर से आवाज आई। बेटा, पापा को फोन दो। बेटे ने मासूमियत से जवाब दिया, पापा तो सो रहें हैं। मैं नहीं जगाने वाला। फोन करने वाले ने जब जरूरी काम कहा तो बेटे को भी दया आ गई। वह मेरे हाथ को पकड़कर बोला-पापा उठो। जरूरी काम वाले अंकल का फोन है। 

न चाहते हुए भी आंखें खोलनी पड़ी। हेलो कहते ही उलाहने का स्वर सुनने को मिला। कोई चाहे मर जाए, तुम शर्मा जी सोते रहना। मैंने कहा- हां जी, छाबड़ा जी। क्या हो गया। ऐसी कौन सी आफत आन पड़ी। छाबड़ा जी बोले-लोकडाउन ने जिंदगी झंड करके रख दी है। क्या करें, क्या न करें। समझ ही नहीं आ रहा। 

मैंने कहा-अब बताओ भी। ऐसा क्या हो गया आज। दो पैग रात को ज्यादा चढ़ा लिए थे क्या। यह कहते ही छाबड़ा जी का दर्द फूट पड़ा। बोले- तुम दो पैग ज्यादा कह रहे हो। यहां दर्शन किए बीस दिन हो गए। मुझे ये थोड़े ही पता था कि ऐसा हो जाएगा। फिर घर पर तो वैसे भी जासूसी होती रहती हैं। दाे मिनट दूसरे कमरे में क्या बैठो। उसी समय आवाज आ जाती है। जानती हूं क्या कर रहे होगे। कुछ शर्म करो। अब उसे कौन समझाए कि ढक्कन चाटकर काम चला रहे हैं।

मैंने कहा तो ये तो कोई ऐसी समस्या नहीं। नवरात्र में भी तो तुम पूर्ण उपवास पर रहते हो। ऐसा मान लाे इस बार के नवरात्र कुछ ज्यादा दिनों के हैं। छाबड़ा जी बोले-भाई ये मान के तो दिन निकल रहे हैं। पर इससे बीमारी तो बढ़ रही है। मैंने कहा -तुम्हें कौन सी बीमारी हो गई। ऐसा क्या हो गया है। छाबड़ा जी बोले- कुछ बेचैनी महसूस कर रहा हूं। घबराहट भी है। हाथ-पैरों में जकड़न भी है। ताजी हवा खाने का मन कर रहा है। घर में घुटन सी हो रही है। बताओ क्या करूं।

मैंने भी गम्भीरता दिखाते हुए कहा कि ये सारे लक्षण है तो चिंता का विषय। आपको तुरंत उपचार की जररूत है। बीमारी बड़ी है। देरी की तो खतरा बढ़ सकता है। दिमाग की नसें फट सकती है। हाथ-पैर सुन्ने हो सकते हैं। घबराहट बढ़ी तो हार्टफेल भी हो सकता है। तो क्या करूं। आप समझदार हैं कोई उपाय बताओ। छाबड़ा जी ने प्रार्थना की। मैंने कहा-इलाज तो है। पर जोखिम उठाना पड़ेगा। हिम्मत है तो बताऊं। छाबड़ा जी ने हामी भरी तो मैंने कहा कि आजकल इस बीमारी के डॉक्टर तो शहर के हर चौराहे पर हैं। छाबड़ा जी बोले-मसखरी मत करो। इलाज बताओ इलाज। मैंने कहा-इलाज तो ही बता रहा हूं। गली के नुक्कड़ पर पुलिसवालों का नाका है। दिनभर वो इसी बीमारी का इलाज करते है। एक बार पास जाकर बताओ तो सही। एक लठ से घबराहट बैचैनी दूर हो जाएगी। दूसरे लठ से हाथ-पैर की जकड़न दूर कर देंगे। तीसरा पड़ते ही तो ताजी हवा खाना भूल घर की राह पकड़ोगे। इन दिनों इस बीमारी का इससे बढ़िया कोई इलाज नहीं है। अपने जांगड़ा साहब से पूछ लो। उनकी भी यही बीमारी थी। दो लठ में ही इलाज पूरा हो गया था। दोबारा बुलाया था गए ही नहीं।

छाबड़ा जी जोर से हंसे। मान गए डॉक्टर साहब। गजब का इलाज बताया है। प्रैक्टिकल की जरूरत ही नहीं, सोचने से ही रोग दूर हो गया। ये इलाज तो मैं औरों को भी बताऊंगा। यह कहकर फोन काट दिया। मैं अब उठकर किसी और के फोन का इंतजार करने लगा।

- लेखक को पत्रकारिता में 20 वर्ष का अनुभव है। फिलहाल लेखक स्वतन्त्र लेखन और शिक्षण कार्य में जुटे हुए हैं। 

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