पहले 1 दिन का लॉकडाउन, फिर 21 दिन का लॉकडाउन।  इस लॉकडाउन के अलावा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के पास कोई विकल्प नहीं था क्योंकि कोरोनावायरस के संक्रमण से बचाव का एकमात्र यही और सही उपाय है। अचानक इतने ज्यादा दिनों के लॉकडाउन से देश की व्यवस्था का गड़बड़ाना भी  तय है क्योंकि न तो इस तरह के लॉकडाउन के लिए हमारी व्यवस्था तैयार थी और न ही हम लोग। इस स्थिति की बानगी कल गाजियाबाद में देखने को मिली,जहां शनिवार शाम को यूपी बिहार के लिए निकले लोगों की जबरदस्त भीड़ जुट गई। लोगों का कहना था- हम रुक नहीं सकते, हमें अपने घर पहुंचना ही होगा, रुके तो भूख से मर जाएंगे। निसंदेह यह दृश्य बेहद पीड़ादायी था। खुद को उन पलायन कर रहे लोगों की जगह रखकर देखता हूं तो एकदम से कंपकपी छूट जाती है।
        भारत में कोरोना संक्रमित लोगों का बढ़ता आंकड़ा चिंताजनक है। सबसे ज्यादा चिंता देश के उन 8 फ़ीसदी लोगों की है जो 60 साल से ऊपर हैं। कोरोना वायरस का खतरा सिद्धांततः उन्हें सबसे ज्यादा है। ऐसे में सबसे ज्यादा जरूरी है कि हम शासन के निर्देशों का पालन करें और सकारात्मक माहौल बनाने में अपनी पूरी भूमिका अदा करें। पत्रकारिता क्षेत्र का होने के नाते कई बार मुझे खुद भी व्यवस्था के खिलाफ चोट करनी पड़ती है, कटाक्ष करने पड़ते हैं लेकिन उनका मूल उद्देश्य सिर्फ व्यवस्था को बदलने की कोशिश में अपना योगदान देना होता है और शायद मेरा काम भी यही है। यह विपदा की घड़ी है तथा इस घड़ी में हमारा सबसे बड़ा योगदान तो यही है कि हम अपने घर में ही रहें और घर से ही जितने काम निपटा सकते हैं उतना निपटा लें। अगर कोरोना वायरस के संक्रमण से पीड़ितों और लॉकडाउन से उपजी अव्यवस्था में कुछ मदद वाकई हम करना चाहते हैं तो मदद लेने के लिए संबंधित माध्यम हमारे घर से मदद ले जाएंगे। आर्थिक मदद राहत कोष में ऑनलाइन जमा की जा सकती है।

        बुजुर्गों के अलावा बड़ी चिंता का सबब वे लोग हैं जो कल  गाजियाबाद की भीड़  में शामिल थे। ये लोग कार्यस्थलों से अपने घर की ओर पलायन कर रहे हैं। ये चलते जा रहे हैं। कुछ अकेले, तो कुछ सपरिवार। कोरोना वायरस के भय ने इन्हें अपनी रोजी रोटी छोड़कर अपने गांव लौटने को मजबूर कर दिया है। ऐसे लोगों की तादाद बहुत ज्यादा है। ये लोग शहरों से अपने-अपने गांव की ओर पलायन कर रहे हैं। इन लोगों में  नन्हे-मुन्ने बच्चों से लेकर बुजुर्ग तक सभी शामिल हैं। लोग सैकड़ों किलोमीटर  पैदल चलते जा रहे हैं, चलते जा रहे हैं। इन्हें बस अपना गांव दिख रहा है, अपना घर दिख रहा है। संक्रमण का खतरा इन लोगों में बहुत ज्यादा है। समूह में पलायन कर रहे लोगों ने पूरी व्यवस्था के माथे की चिंता की लकीरें गहरी कर दी हैं। अगर इन लोगों के ऑन स्पॉट रोके जाने के समुचित इंतजाम सरकार ने नहीं किए तो स्थितियां और ज्यादा विकराल रूप ले सकती हैं। ये जहां हैं, वहीं इन्हें रोके जाने का सिर्फ एक ही उपाय है कि सरकार व्यापक स्तर पर जन आश्रय केंद्र बनाए और वह भी तुरंत।

        देश के जितने भी शासकीय स्कूल हैं उनको सरकार जन आश्रय केंद्र बना दे तो व्यवस्था बनाने में काफी सहूलियत होगी। सरकार चाहे तो प्राइवेट विद्यालयों का भी आश्रय केंद्र बनाने में उपयोग कर सकती है। सारे ऐसे एनजीओ जिन्होंने कभी भी समाज सेवा के रूप में सरकार से किसी भी प्रकार की राशि का सहयोग लिया है उनके सहित सभी समाजसेवी संस्थाओं, लोगों को इन आश्रय केंद्रों का जिम्मा दे दिया जाए। आश्रय केंद्र बहुत संख्या  में होने के कारण लोगों को दूर-दूर भी रखा जा सकता है। सरकारी तंत्र के बहुत सारे लोगों को इन लोगों की व्यवस्था में पूरे सुरक्षा साधनों के साथ जोड़ा जा सकता है।

        जन आश्रय केंद्र हर ग्राम पंचायत स्तर से लेकर राजधानी दिल्ली तक सॉरी देश में एक साथ तुरंत बनाए जा सकते हैं। हर जगह विद्यालयों के शासकीय भवन हैं, प्राइवेट स्कूल भी गांव-गांव संचालित हो रहे हैं। इस समय वे बिल्डिंग्स बंद पड़ी हैं। इस महामारी से निपटने इन बिल्डिंग्स का सदुपयोग किया जा सकता है। सड़कों में खड़े होकर, सार्वजनिक स्थलों में जाकर तमाम दानदाता दान करते दिख रहे हैं उनके सामने जीवन उपयोगी सामग्री लेने वाले जरूरतमंदों की भीड़ दिखती है। अगर ये दानदाता आश्रय केंद्रों में पहुंच जाएंगे तो अनावश्यक भीड़ भी कहीं पर नहीं जमा होगी। काफी कुछ व्यवस्थित हो जाएगा। मुझको लगता है सरकार के लिए इस तरह व्यवस्था बनाना ज्यादा मुश्किल नहीं है और यह व्यवस्था तत्काल प्रभाव से योजनाबद्ध तरीके से बनाई जा सकती है। 

        अपनी बात का अंत दुष्यंत कुमार की इन कालजयी पंक्तियों के साथ-

सिर्फ हंगामा खड़ा करना मेरा मकसद नहीं, मेरी कोशिश है कि ये सूरत बदलनी चाहिए।

- लेखक गुड मॉर्निंग इंडिया मीडिया के समूह संपादक हैं।

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